आपाधापी में जीवन की

कुछ दशक पहले
अभाव में जिया जीवन
खाकर रुखा-सूखा
रहते थे निश्चिंत, प्रसन्न

मिट्टी, फूस से बने, घर छोटे-छोटे
कमरे में एक, कई लोग रहते
खटमल, मच्छर होते बेशुमार
चैन से थे पर सोते

रहते थे मिलजुल कर
भाईचारा था अपार
सुख-दुःख में एक-दूसरे के
काम आना था सरोकार

सुख-सुविधा से हैं अब संपन्न
भवन बड़े-बड़े आलिशान
दो-चार ही लोग उनमे रहते
नींद के लिये हैं गोली लेते

कीमती फ़ोन है आजकल फैशन
महंगी कार, एसयूवी का है प्रचलन
बड़े-बड़े मॉल में होती खरीददारी
डोमिनोज़, मैकडोनेल में होता भोजन

बन गया है वेतन पैकेज, प्रतिष्ठा का नया प्रतीक
राजी-खुशी नहीं, पैकेज हैं आजकल पूछते
भाग्यशाली कुछ लोग, पैकेज सुनहरा जब हैं पाते
प्रमुख स्थान के साथ, समाचार पत्र गुण-गान खूब हैं गाते

मेरी इच्छा, मेरी जिंदगी
आधुनिकता का है नया आदर्श उद्घोष
सवेंदना, सहानुभति समझी जाती कमजोरी
सफलता पाने में यह है रोड़ा अटकाती

हासिल हो गये हैं भौतिक साधन
सुगम हो गया है जीवन-यापन
नहीं लेकिन कोई, बैठ कुछ क्षण साथ
दुःख-सुख में दे थोड़ा चैन-सुकून

आगे बढ़ने की होड़ में
बहुत कुछ पाने के लोभ में
दिया त्याग नीतिवचन
उच्च-विचार, सादा-जीवन

सबक, सादगी व संतोष का
नज़रअंदाज़ कर रहे हम
भौतिकता की अंधाधुंध दौड़ में
देखा-देखी शामिल हो गये हम

खो रहे हैं बहुत कुछ, आपाधापी में जीवन की
सांस हैं थोड़ा लेते, करते हैं मंथन, चिंतन
जीवन है यदि सुख-संतोष से जीना
इच्छाओं की उड़ान पर, अंकुश होगा थोड़ा लगाना