चूड़धार, एक धार्मिक और साहसिक गंतव्य

‘मुझे पहाड़ प्रिय हैं क्योंकि वह मुझे मेरे बौनेपन का अहसास कराते हैं’ - मार्क औबमास्चिक

चूड़धार जिसको चूड़चाँदनी के नाम से भी जाना जाता है दक्षिण हिमाचल प्रदेश में सबसे ऊँचीं पर्वत चोटी है। यह जिला सिरमौर में स्थित है और सिरगुल देवता, भगवान शिव के एक अवतार, के मन्दिर और प्राकृतिक सौन्दर्य के लिए प्रसिद्ध है। मन्दिर को चूड़ेश्वर महादेव के नाम से भी जाना जाता है। चूड़धार के बारे में बहुत सी पौराणिक कथायें प्रचलित हैं। दन्त कथाओं के अनुसार यह माना जाता है कि भीम के नाती बारबरिक ने महाभारत का युद्ध ११,९६५ फीट की ऊँचाई पर स्थित चूड़धार की चोटी से देखा था। यह भी कहा जाता है कि लक्ष्मण की जान बचाने के लिए हनुमान संजीवनी बूटी यहीं से लेकर गए थे।

चूड़धार की यात्रा के लिये मई से नवम्बर के बीच का समय उपयुक्त रहता है क्योंकि बाकी वक्त यह स्थान बर्फ से ढका रहता है। यहाँ पर र्सिफ पैदल चल कर ही पहुँचा जा सकता है। चूड़धार के लिए नौहराधार से करीब १६ किमी लम्बा पैदल मार्ग है। स्थानीय निवासी इस दूरी को करीब ६ घण्टे में तय कर लेते हैं लेकिन बाहर से आने वालों के लिये कम से कम १० घण्टे मान कर चलना उचित रहेगा। प्रकृति का बेहतर आनन्द उठाने के लिए चूड़धार की ओर जाने वाली यात्रा को दो दिन में तय करना उपयुक्त रहेगा। पहले दिन की यात्रा के बाद रात्रि पड़ाव के लिए देवदार के मनोहारी वृक्षों से घिरे एक हरे-भरे स्थल जमनाला को चुना जा सकता है। यह स्थान करीब-करीब चूड़धार और नौहराधार के मध्य में स्थित है। उतराई होने के कारण चूड़धार से नौहराधार के लिए वापसी यात्रा एक दिन में आसानी से पूरी की जा सकती है। जिला शिमला में चौपाल के पास स्थित सराहाँ से चूड़धार जाने के लिए ८ किमी पैदल मार्ग भी चुना जा सकता है।

चण्डीगढ़ से नौहराधार करीब १५० किमी की दूरी पर स्थित है और रास्ता सोलन व राजगढ़ से होकर जाता है। नौहराधार कुछ दुकानों, होटलों और एक पी डब्लू डी के विश्राम गृह सहित एक छोटा सा कस्बा है। नौहराधार के आस-पास अनेकों छोटे-छोटे गाँव स्थित हैं और यहाँ से विभिन्न पर्वत श्रंखलाओं का विहंगम दृश्य नजर आता है। मौसम साफ रहने पर चूड़धार चोटी भी यहाँ से स्पष्ट नजर आती है।

चूड़धार के लिए यह हमारा तीसरा प्रयास था। पिछले प्रयासों में हमें जमनाला से थोड़ा आगे भारी हिमपात के कारण वापस लौटना पड़ा था। और आपको यकीन नहीं होगा यह मई के माह में हुआ जब उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्र गर्मी की भयंकर मार झेल रहे थे। इस बार हमने सितम्बर, २०१३ का तीसरा सप्ताह चुना और हमारे दल में ९ लोग थे जिनमें ७ एस सी एल से थे। विपुल व अनीश डिजाइन से( आर के सैनी, परवीन राणा, ठाकुर गुरमीत, पुष्पेन्द्र गुसाईं टैस्टिंग से और मन्जिदर सिंह सुविधा विभाग से।

हमने नौहराधार से चूड़धार के लिए सुबह ९ बजे यात्रा प्रारम्भ की। शुरु के दो किमी का रास्ता सीधी चढ़ाई वाला है। वृक्षविहीन पहाड़ी ढलान पर दूर-दूर स्थित इक्के-दुक्के घर और छोटे-छोटे फसल उगे खेत इस दौरान नजर आते हैं। खड़ी चढ़ाई ने यात्रा के शुरूआत में ही साँसों की गति तेज कर दी और हर एक कदम बढ़ाने के लिए अथक प्रयास करना पड़ रहा था। थकान से पस्त होने के कारण हम कुछ देर विश्राम की सोच ही रहे थे कि भाग्यवश चाय की एक दुकान नजर आई जो वरदान स्वरूप लगी।

दुकानदार, जोकि उम्र के चालिसवें दशक में थे, ने एक व्यापक मुस्कान के साथ हमारा स्वागत किया। वह मूल रूप से किसान हैं और गर्मियों में यहाँ पर अपनी खेती करने आते हैं और फिर सिर्र्दयों में कम ऊँचाई पर स्थित अपने दूसरे घर वापस चले जाते हैं। खेती के साथ-साथ वह चूड़धार जाने-वाले यात्रियों की जरूरतों को पूरा करते हैं। हम लोगों में से कुछ ने चाय और शेष ने लस्सी पी। दुकानदार ने लस्सी घर की बनी होने के कारण उसका मूल्य लेने से इन्कार कर दिया। उनकी उदारता का धन्यवाद कर हम आगे बढ़ गए। पेय ने हमारे थके शरीर में नई जान फूँक दी थी।

आरम्भिक २ किमी की खड़ी चढ़ाई के बाद रास्ता थोड़ा समतल है। सीड़ीनुमा खेतों में उगे अदरक, मटर और फूलगोभी के पौधों के बीच से गुजरते हुए हम चूड़धार के रास्ते पर स्थित अन्तिम गाँव जौ-का-बाग पहुँचे। गाँव से आगे रास्ता बाँज व बुराँस के पेड़ों से होकर गुजरता है। जंगल की छटा, पक्षियों की चहचहाहट, विभिन्न प्रकार के सुन्दर फूलों की झलक और सुगंधित ताजी हवा उत्साहवर्धन करती है। इस भाग में औषधीय पौधे, जड़ी-बूटियाँ, हिंसोर और किनगोड़ प्रचुर मात्रा में है। इस दौरान हमें चूड़धार से लौटते बहुत से स्थानीय लोग भी मिले। यह लोग अवश्य ही पौ फटते चूड़धार से निकले होंगे।

लगभग ३ घण्टे चलने के बाद हम जमनाला पहुँचे। इस स्थान को ‘दूसरी’ भी कहते हैं। देवदार के आकर्षक घने वृक्षों से घिरा यह सुरम्य स्थल अपनी अनुपम सुन्दरता से एकाएक वशीभूत कर लेता है। यह गुज्जर लोगों के ठहरने का स्थान भी है। वे ग्रीष्मकाल में अपने मवेशियों के साथ यहाँ पर ठहरते हैं और सर्दियों में कम ऊँचाई वाले इलाकों में चले जाते हैं। स्थानीय लोगों द्वारा संचालित यहाँ पर दो अस्थाई ढाबे भी हैं जहाँ पर दाल-चावल के साथ-साथ चाय व मैगी मिल जाती है। आपात स्थिति में इन ढाबों में रात को ठहरा भी जा सकता है।

जमनाला को छोड़ हमने खरसू बाँज और कई अन्य प्रजातियों के वृक्षों से भरे घने वन में प्रवेश किया। जंगल इतना घना है कि सूर्य की किरणे पेड़ों के पत्तों में ही उलझ कर रह जाती हैं इसलिए इस क्षेत्र में वातावरण नम व ठण्डा रहता है। कई जगह पत्तों से ढके कंकरीले रास्ते के किनारे फर्न के झुरमुट दिखाई पड़ते हैं। अनेकों बार हमें पेड़ों के नीचे से रेंग कर या उनके ऊपर से कूद कर आगे बढ़ना पड़ा। मधुर ध्वनि व तरगें उत्पन्न करती कई जल धारायें रास्ते से गुजरती हैं। आस-पास की पहाड़ियों से पक्षियों के मीठे स्वर सुनाई देते हैं मगर उन्हें घने पत्तों के बीच देख पाना मुश्किल होता है।

जमनाला से दो घण्टे की आन्नददायक यात्रा तय कर हम ‘तीसरी’ पहुँचे। पत्थरों को व्यवस्थित कर बनाई गई दीवारों पर टिके लकड़ी केे ढाँचे पर तिरपाल बिछा कर बनाया गया कामचलाऊ ढाबा यहाँ पर गर्म-गर्म चाय और मैगी से आगन्तुकों का स्वागत करता है। ‘तीसरी’ लगभग १०,००० फीट की ऊँचाई पर स्थित एक दर्रा है। दर्रा होने के कारण यहाँ पर हवा तेज गति से बहती है। यहाँ से चौपाल क्षेत्र, दूराज स्थित गाँव, विभिन्न चोटियों और पर्वत मालाओं का दृश्य नजर आता है। मनोरम दृश्य मन को अभिभूत कर देता है। नौहराधार से यहाँ तक पहुँचने में हमें करीब ६ घण्टे लग गये।

‘तीसरी’ के बाद रास्ता ‘चूड़-का-पत्थर’ तक काफी हद तक समतल है और घने जंगल से होकर गुजरता है। वन्य परिवेश से गुजरते हुए हमें ‘तीसरी’ से ‘चूड़-का-पत्थर’ तक पहुँचने में करीब डेढ़ घण्टा लगा। एल्पाइन क्षेत्र में स्थित होने के कारण ‘चूड़-का-पत्थर’ पर वनस्पति प्रचुर मात्रा में है। यहाँ पर हरे मखमली घास की परत लिए हल्के पहाड़ी ढलान और विभिन्न प्रकार के रंग-बिरंगे फूल मन मोह लेते हैं। चूड़धार जाने वाले स्थानीय लोग यहाँ पर कुछ अनषुठान के अलावा घर से लाये आहार का सेवन भी करते हैं।

यहाँ पर एक सदाबहार जल स्रोत भी है। स्रोत का शुद्व व शीत जल न सिर्फ पथिकों की प्यास बुझाता है बल्कि विभिन्न प्रकार की वनस्पति का जनक भी है। खन-खन करती बहती जल धारा के आस-पास कई प्रकार की फर्न व फूलों के पौधों की भरमार है। बहते हुए पानी को धारा का आकार देने के लिए एक खोखली डंठल को पहाड़ी पर उपयुक्त स्थान पर लगाया हुआ है जिससे होकर पानी धारा का रूप ले लेता है।

‘चूड़-का-पत्थर’ से आगे रास्ता बड़ी-बड़ी चट्टानों से होकर गुजरता है और काफी ऊँचा-नीचा है। कई जगह विशालकाय चट्टाने रास्ते को छतरी की तरह ढके हुए हैं। अभी हम चूड़धार से करीब १ किमी दूर ही रहे होंगे कि अंधेरा छाने लगा। यह आखिरी फासला थकान के कारण वैसे भी मुश्किल लग रहा था लेकिन अंधेरे ने कठिनाई और बढ़ा दी। इसी दौरान बादल भी उमड़-उमड़ कर छाने लगे और गगनभेदी गर्जन के साथ अपनी उपस्थिति का आभास करा रहे थे। हम स्थिति की नाजुकता से सहम गए और जल्दी से चूड़धार पहुँचने के लिए अपनी चाल को तेज किया क्योंकि हमारे पास बरसाती या छाते नहीं थे। टाॉर्च के धुंधले प्रकाश में चट्टानों के मध्य अपनी राह तलाशते हम किसी तरह अपने गंतव्य तक पहुँचने में सफल हुए।

मन्दिर परिसर में एक काफी बड़ी धर्मशाला और कुछ छोटी-छोटी दुकाने हैं। धर्मशाला के प्रभारी ने हमें एक कमरा आबंटित किया और बहुत ही कम दर पर कम्बल उपलब्ध कराये। हर एक को तीन-तीन कम्बल दिये गये क्योंकि ठण्ड बहुत अधिक थी। अभी हम आबंटित कमरे में अपना सामान व्यवस्थित कर ही रहे थे कि जोरदार वर्षा शुरू हो गई। और थोड़ी देर बाद देखते-देखते ओले भी गोलियों की भाँति बरसने शुरू हो गए। खुले में स्थित वस्तुयें ओलों के प्रहार का शिकार बन रही थी। हमने अपने-अपने स्थान पर दुबके-दुबके इन्द्र देवता को हमें सुरक्षित मन्दिर परिसर में पहुँचने का मौका देने के लिए मन ही मन धन्यवाद दिया। रात्रि लंगर की घोषणा होने पर हमने लंगर किया और फिर कमरे में आकर अपने-अपने बिस्तर पर लुढ़क गये। थकान के कारण नींद ने जल्दी ही सबको अपने आगोश में ले लिया।

अगली सुबह खुश-किश्मती से मौसम खुल गया था और हम लोगों ने मन्दिर पहँच कर पूजा-अर्चना की। मन्दिर का वास्तुशिल्प हिमाचली है और मन्दिर के अन्दर भगवान शिव की मूर्ति स्थित है। मन्दिर के बाहरी परिसर में एक शिवलिंग है। अत्यंत सर्दी के बावजूद बहुत से श्रद्धालू अनुष्ठान स्नान कर रहे थे।

हमारे कमरे के समीप स्थित पत्तों से विहीन एक वृक्ष पर बैठे कौवों के समूह ने जोर-जोर से काँव-काँव कर अपनी मौजूदगी का अहसास कराया। पहाड़ों में कौवे मैदानों की अपेक्षा आकार में थोड़ा बड़े व गहरे काले रंग के होते हैं।

रात की बारिस और ओलों का असर सुबह के मौसम में स्पष्ट नजर आ रहा था। उदित होते सूर्य का गहरी लालिमा लिये प्रकाश सभी दिशाओं में फैल रहा था। वर्षा द्वारा नहलाये वातावरण में सुदूर हिमालय की चोटियाँ स्पष्ट नजर आ रही थी। इक्के-दुक्के बादल अभी भी दूर क्षितिज पर मंडरा रहे थे। और इस अद्भुत नजारे को अलविदा कह हमारे वापस लौटने की घड़ी निकट आती जा रही थी।