मैं हूँ कौन
मैं दौड़े जा रहा हूँ बेतहाशा
सब कुछ पाने की मन में लिए आशा
नहीं रखता हूँ पास-पड़ोस जानने की कोई जिज्ञासा
मुझे मंजिल है अपनी पानी
पड़े नीती चाहे कोई भी अपनानी
खूब करता है काम, दिमाग मेरा शैतानी
मुझे चाहिये मेरे अधिकार
दूसरों के बारे में नहीं करता विचार
कर्तव्य से है मुझे विकार
मेरा परिवेश है मेरा परिवार
बहुत हुआ तो नाते रिस्तेदार
बािेकयों से नहीं कोई सरोकार
तरक्की मुझे है अपनी प्यारी
करनी पड़े चाहे चोर बाजारी
नहीं जानता क्या होती लाचारी
भरनी है मुझे अपनी तिजोरी
खींच लूट-खसोट और शोषण की डोरी
जानता नहीं न्याय की कोई थ्योरी
स्वार्थ सिद्धी है मेरा सिद्धान्त
नहीं रखता हूँ कोई इमान
मुझे तो चाहिये बस मेरा मुकाम
आप बताइये मैं हूँ कीैन
मैं हूँ एक इंसान
इंसानियत की नहीं जिसको पहचान